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कौन हैं.? मरवाही वनमण्डल के ‘खिलाड़ी’ शैल गुप्ता और ‘जादूगर’ भूपेंद्र साहू, जिनके इशारों पर नाचती हैं फाइलें?

मिथलेश आयम, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही : छत्तीसगढ़ के मरवाही वनमंडल से ‘हरियाली’ के नाम पर जो खबरें निकलकर आ रही हैं, वे केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सरकारी खजाने की खुली डकैती का संकेत देती हैं। CAMPA से लेकर ग्रीन क्रेडिट तक, यहाँ विकास का पहिया ज़मीन पर नहीं, बल्कि फाइलों की रफ्तार पर घूम रहा है।

​घोटाले का ‘ग्रीन’ फॉर्मूला,पुरानी जड़ों पर नया चूना :-

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​मरवाही में भ्रष्टाचार का तरीका इतना शातिर है कि जादूगर भी शरमा जाएं। आरोपों के मुताबिक,यहाँ 2018 से 2025 के बीच ‘अदृश्य जंगल’ उगाए गए हैं :-

•​ पौधों का पुनर्जन्म -: आरोप है कि मनरेगा के तहत लगे पुराने पौधों को ही नया रोपण बताकर 3 लाख पौधों की फर्जी एंट्री कर दी गई।

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• ​करोड़ों की ‘कागजी’ हरियाली -: बिना सिंचाई, बिना सुरक्षा घेरे और बिना पौधों के, ग्रीन क्रेडिट योजना के नाम पर करीब 1.80 करोड़ रुपये डकार लिए गए।

• ​गायब विरासत -: जिन 500 हेक्टेयर में घने जंगल का दावा था, वहाँ आज सन्नाटा पसरा है। हकीकत में 70% से ज्यादा पौधे ‘लापता’ हैं।

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​सिंडिकेट के ‘खिलाड़ी’ फाइलों के दो अनमोल शैल गुप्ता – भूपेंद्र साहू जादूगर :-

​इस पूरे खेल में निचले कर्मचारियों से लेकर दफ्तर में बैठे ‘साहबों’ तक की भूमिका संदिग्ध है। शिकायतों की उंगलियां सीधे तौर पर दो जादूगर कर्मचारियों पर उठ रही हैं -:

• ​मुख्य लिपिक (शैल गुप्ता):- फाइलों के प्रबंधन और बंदरबांट की कड़ियों को जोड़ने का आरोप।

• ​शाखा प्रभारी (भूपेंद्र साहू): CAMPA मद की राशि को ‘ठिकाने’ लगाने की कार्यप्रणाली पर सवाल।

• ​मैदानी अमला: ज़मीनी हकीकत को जानते हुए भी ‘सब चंगा है’ की रिपोर्ट भेजने वाले जिम्मेदार।

>• ​कड़वा सच मरवाही वनमंडल संरक्षण का मॉडल बनने के बजाय भ्रष्टाचार की नर्सरी बन चुका है। नर्सरी के नाम पर फर्जी बिलिंग और लेंटाना उन्मूलन के नाम पर सिर्फ बजट का ‘उन्मूलन’ किया गया है।

​❓ मुख्य सवाल -: कार्रवाई कब?

​जब 500 हेक्टेयर में हरियाली का नामोनिशान नहीं, तो पेमेंट कैसे हुआ ​जांच की मांग के बावजूद सिस्टम की चुप्पी क्या बड़े हिस्सेदारों को बचाने की कोशिश है ​क्या ‘ग्रीन क्रेडिट’ के नाम पर पर्यावरण के साथ यह मज़ाक ऐसे ही चलता रहेगा ​यह मामला अब केवल प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि एक संगठित वित्तीय अपराध का है। देखना यह है कि क्या शासन इन ‘कागजी जंगलों’ के सौदागरों पर नकेल कसेगा या यह फाइल भी धूल फांकते हुए दम तोड़ देगी।

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